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Gagan Khoda: 89 रन, मैन ऑफ द मैच,फिर टीम इंडिया में क्यों नहीं मिला दूसरा मौका? गगन खोडा की कहानी

gagan Khoda

89 रन, मैन ऑफ द मैच,फिर टीम इंडिया में क्यों नहीं मिला दूसरा मौका? गगन खोडा की कहानी

खेल नॉनस्टॉप, नई दिल्ली: क्रिकेट में कुछ खिलाड़ियों का करियर आंकड़ों से ज्यादा एक सवाल छोड़ जाता है। Gagan Khoda भी उन्हीं खिलाड़ियों में शामिल हैं। भारत के लिए उन्होंने सिर्फ दो वनडे खेले। दूसरे ही मैच में 89 रन बनाकर मैन ऑफ द मैच बने, लेकिन इसके बाद उन्हें दोबारा भारत की वनडे टीम में खेलने का मौका नहीं मिला।

दिलचस्प बात यह है कि खोडा की कहानी सिर्फ उन दो अंतरराष्ट्रीय मैचों की नहीं है। भारत के लिए खेलने से पहले वह घरेलू क्रिकेट में लगातार रन बना चुके थे और बाद में भी उन्होंने ऐसी पारियां खेलीं, जिनसे उनकी बल्लेबाजी की क्षमता पर कोई सवाल नहीं उठता था। फिर ऐसा क्या हुआ कि उनका अंतरराष्ट्रीय सफर सिर्फ छह दिन में खत्म हो गया?

दूसरे मैच में 89 रन और वही आखिरी मैच बन गया

गगन खोडा ने 14 मई 1998 को बांग्लादेश के खिलाफ अपना वनडे डेब्यू किया। उस मैच में उन्होंने 56 गेंदों पर 26 रन बनाए। इसके सिर्फ छह दिन बाद, 20 मई को केन्या के खिलाफ उन्हें फिर मौका मिला। बेंगलुरु में खेले गए उस मुकाबले में खोडा ने 129 गेंदों पर 89 रन की पारी खेली। उनकी पारी में आठ चौके शामिल थे और इस प्रदर्शन के लिए उन्हें मैन ऑफ द मैच चुना गया। भारत ने यह मुकाबला चार विकेट से जीता।

यहीं से कहानी सबसे ज्यादा हैरान करती है। दो मैचों में खोडा ने कुल 115 रन बनाए और उनका वनडे औसत 57.50 रहा। लेकिन 89 रन की उस पारी के बाद उन्हें भारत के लिए तीसरा वनडे खेलने का मौका कभी नहीं मिला। यानी जिस खिलाड़ी ने अपने दूसरे ही अंतरराष्ट्रीय मैच में मैच जिताऊ प्रदर्शन किया, उसका अंतरराष्ट्रीय करियर वहीं रुक गया।

उस समय भारत की टीम में सलामी बल्लेबाजों के स्थान को लेकर लगातार बदलाव हो रहे थे। एनडीटीवी की 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक, खोडा को नियमित खिलाड़ियों की वापसी के बाद टीम से बाहर होना पड़ा था। लेकिन खोडा के लिए यह अंत नहीं था। असली सवाल यह था कि क्या वह घरेलू क्रिकेट में इतने रन बनाने के बावजूद दोबारा राष्ट्रीय टीम का दरवाजा खोल पाएंगे?

89 रन की मैन ऑफ द मैच पारी के बाद आखिर तीसरा वनडे क्यों नहीं मिला?

घरेलू क्रिकेट में रिकॉर्ड, फिर भी टेस्ट कैप नहीं मिली

भारत के लिए खेलने से काफी पहले ही खोडा ने राजस्थान के लिए अपनी पहचान बना ली थी। 1991-92 रणजी ट्रॉफी में पदार्पण करते हुए उन्होंने अपने पहले ही प्रथम श्रेणी मैच में शतक जड़ा था। इसके बाद 1994-95 का रणजी सीजन उनके करियर के सबसे शानदार दौर में से एक रहा। उस सीजन खोडा ने 618 रन बनाए और उनका औसत 77.25 रहा। इसमें दो शतक और दो अर्धशतक शामिल थे। सबसे यादगार पारी उत्तर प्रदेश के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में आई, जहां उन्होंने नाबाद 237 रन बनाए।

यह पारी इसलिए भी खास थी क्योंकि राजस्थान पहली पारी में सिर्फ 237 रन पर आउट हो गया था और उत्तर प्रदेश ने बड़ा स्कोर खड़ा किया था। दूसरी पारी में खोडा ने अकेले मोर्चा संभालते हुए नाबाद 237 रन बना दिए। राजस्थान ने दूसरी पारी में 417/5 का स्कोर बनाया, लेकिन पहली पारी में पिछड़ने के कारण टीम मुकाबले से बाहर हो गई। 1997 में खोडा को श्रीलंका दौरे के लिए भारत की टेस्ट टीम में भी जगह मिली, लेकिन उन्हें टेस्ट डेब्यू का मौका नहीं मिला। अगले साल वह भारत ए टीम के कप्तान बनकर पाकिस्तान दौरे पर गए और वहां 189 रन की पारी भी खेली।

इसके बाद 1998 में भारत के लिए दो वनडे खेलने का मौका मिला। लेकिन 89 रन की पारी के बावजूद उनकी अंतरराष्ट्रीय वापसी नहीं हो सकी। और कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। 2000-01 दलीप ट्रॉफी में खोडा ने साउथ जोन के खिलाफ नाबाद 300 रन ठोक दिए। उस टीम के गेंदबाजी आक्रमण में जवागल श्रीनाथ, वेंकटेश प्रसाद, सुनील जोशी और वेंकटपति राजू जैसे नाम शामिल थे। खोडा की इस पारी ने उन्हें फिर से भारत ए टीम के चयन के दायरे में ला दिया।

फिर भी भारतीय टीम में उनकी वापसी नहीं हुई। गगन खोडा की कहानी सिर्फ एक ऐसे खिलाड़ी की कहानी नहीं है, जिसे दो मैचों के बाद भुला दिया गया। यह उस बल्लेबाज की कहानी है जिसने घरेलू क्रिकेट में लगातार प्रदर्शन किया, भारत के लिए दूसरे ही मैच में 89 रन बनाए, बाद में 300 रन की पारी खेली, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उसका सफर सिर्फ दो वनडे तक ही सीमित रह गया।

क्रिकेट से दूर हुए, फिर उसी क्रिकेट ने बनाया चयनकर्ता

समय के साथ खोडा सक्रिय क्रिकेट से दूर हो गए। लेकिन 2015 में अचानक उनका नाम फिर भारतीय क्रिकेट में सामने आया। बीसीसीआई ने उन्हें सेंट्रल जोन के प्रतिनिधि के रूप में सीनियर चयन समिति में शामिल किया। उस समय खोडा ने खुद कहा था कि वह कुछ समय से क्रिकेट से दूर थे और यह नियुक्ति उनके लिए भी एक सुखद आश्चर्य थी। एक समय ऐसा था जब खोडा भारतीय टीम में जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। बाद में वही खोडा भारतीय टीम के खिलाड़ियों के चयन की जिम्मेदारी संभालने वाली समिति का हिस्सा बने।

उनके अंतरराष्ट्रीय करियर के बारे में सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है—89 रन की मैन ऑफ द मैच पारी के बाद आखिर तीसरा वनडे क्यों नहीं मिला?

उपलब्ध रिकॉर्ड और उस समय की रिपोर्टों से इतना साफ है कि नियमित खिलाड़ियों की वापसी के बाद उनका स्थान चला गया और इसके बाद उन्हें दोबारा भारत की टीम में जगह नहीं मिली। लेकिन उनके पूरे अंतरराष्ट्रीय करियर को किसी एक आधिकारिक कारण से जोड़ना सही नहीं होगा।

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